One Gautam Buddha Story Hindi | जीवन में बड़े से बडा लक्ष्य पाने की एक आसान तकनीक

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जीवन में बड़े से बडा लक्ष्य पाने की एक आसान तकनीक

हम अपने जीवन में लक्ष्य तो निर्धारित करते हैं परंतु उन्हें हासिल नहीं कर पाते। किसी भी चीज की शुरुआत में तो हमारे भीतर बहुत उत्साह रहता है परंतु धीरे-धीरे वह उत्साह खत्म होने लगता है। नकारात्मकता हमें चारों तरफ से घेरने लगती है। ऐसा क्यों होता है?

अगर आप के भीतर भी यह प्रश्न है तो गौतम बुद्ध के जीवन की यह घटना, यह कहानी आपके लिए है। मैं आपको विश्वास दिलाना चाहता हूं कि आप इस लेख के अंत तक इस काबिल बन जाएंगे कि आप अपने किसी भी लक्ष्य को पा सके।

गौतम बुद्ध के जीवन की यह घटना आपको एक गहरी समझ देने वाली है। परंतु इस समझ को समझने के लिए आपको धैर्य की आवश्यकता है। ध्यान से समझने का प्रयास करिएगा।

गौतम बुद्ध, बुद्ध होने से पहले सिद्धार्थ के नाम से जाने जाते थे। उनके जीवन में शारीरिक दुख तो कोई था नहीं। परंतु मानसिक पीड़ा बहुत ज्यादा थी। वह एक राजा के पुत्र थे जिसके कारण उनके जीवन में कोई भी शारीरिक दुख नहीं था। उनके पास हर सुख सुविधा थी परंतु कोई भी सुख सुविधा शारीरिक दुख को तो रोक सकती है परंतु मानसिक दुख को नहीं।

बहुत ज्यादा मानसिक दुख होने के कारण वे तय करते हैं।  कि वे अपना घर परिवार त्याग देंगे। अब हो सकता है कि आप लोग सोच रहे हो की उनके मन में यह विचार कैसे आया कि मानसिक दुख घर त्यागने से खत्म हो जाएगा।  इस प्रश्न का उत्तर है उन्होंने अपने जीवन में कई बार कई सन्यासियों को देखा था जिनसे वे बहुत प्रभावित हुए थे।

जब वे पहली बार एक सन्यासी से मिले थे। तो उनके भीतर एक विचार आया था कि मैं एक राजा का बेटा होने के बाद भी भीतर से दुखी हूं। और यह सन्यासी एक भिखारी होकर भी भीतर से प्रसन्न है। इसलिए उनके भीतर भी यह विचार आया कि उन्हें अपना घर परिवार त्याग देना चाहिए।

अब घर परिवार को त्याग देना भी इतना सरल नहीं है। बहुत हिम्मत का काम है। किसी भी छोटी से छोटी चीज को जिससे हम जुड़ गए हो। उसे छोड़ना हमारे लिए बहुत मुश्किल होता है। जब तक कि हमें उससे बड़ी कोई चीज ना मिल जाए।

परंतु बुध के साथ ऐसा नहीं था उन्हें कोई बड़ी चीज नहीं मिली थी। उन्होंने तो बिना कुछ मिले ही वह सब कुछ छोड़ दिया जो उनके पास था। बुद्ध ऐसा इसलिए कर पाए क्योंकि उनके भीतर यह विश्वास था कि जो दुख उनके भीतर चल रहा है उसका अंत होगा।

किसी भी कार्य की शुरूआत विश्वास के द्वारा ही होती है। आप भी जब कोई लक्ष्य निर्धारित करते हैं तो आपके भीतर भी यह विश्वास होता है कि आप उस लक्ष्य को पा लेंगे। अब यह विश्वास थोड़ा या ज्यादा हो सकता है परंतु होता जरूर है।

अब जब सिद्धार्थ अपने घर को त्याग रहे होते हैं। तो उनके सामने जो पहली समस्या आती है वह होती है कि उन्हें अपने घर के बाहर नंगे पैर निकलना होता है। उन्हें आदत नहीं थी जमीन पर नंगे पैर चलने की परंतु क्युकी उनके पैरों की आहट सुनकर कोई उठ ना जाए इसलिए भी वे नंगे पैर घर से बाहर निकलते हैं।

अब ऐसा नहीं था कि जमीन पर नंगे पैर चलते हुए वे बहुत ज्यादा उत्साह से भरे हुए थे। अब यहां पर समझने वाली सबसे जरूरी बात यह है कि उनकी मंजिल तो दूर थी। परंतु यात्रा की शुरुआत में ही उनके भीतर कोई उत्साह नहीं था।

इस घटना से हमें एक बहुत बड़ा सूत्र मिल रहा है कि किसी भी बड़े से बड़े लक्ष्य को पाने के लिए हमें सिर्फ उत्साह की आवश्यकता नहीं है। क्योंकि अगर उत्साह की ही आवश्यकता होती तो सिद्धार्थ बुद्ध नहीं बन पाते।

कहानी में आगे बढ़ते है। जब सिद्धार्थ अपने सारथी के साथ राज्य की सीमा पर पहुंच जाते हैं। तो सिद्धार्थ अपने सारथी को कहते हैं। अब तुम वापस लौट जाओ तुम्हारा मेरा सफर यही तक का था। अब यहां से आगे मैं अकेला जाऊंगा। सिद्धार्थ अपने सभी आभूषणों और अपने बालों को काटकर अपने सारथी को दे देते हैं।

सिद्धार्थ का सारथी सिद्धार्थ से विनती करता है। कि कृपा कर वापस चले। आपके बिना पूरा राज्य सुना हो जाएगा। अब यहां पर भी मोह हावी हो सकता था। परंतु सिद्धार्थ मोह के बस में नहीं आते और वापस नहीं लौटते।

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हमारा मोह कोशिश करता है हमें वैसे ही रखने की जैसे हम रहते आ रहे हैं। परंतु सिद्धार्थ मोह के वश में नहीं आते और आगे बढ़ जाते हैं। सिद्धार्थ को यह तक पता नहीं होता कि उन्हें जाना कहां है। बस वे निकल पड़ते हैं। अब यहां पर एक बहुत बड़ी बात समझी जा सकती है कि कभी-कभी हमें पता नहीं होता कि हमें जीवन में करना क्या है। हमें जाना कहां है।

जिसके कारण हम कुछ करने की शुरुआत ही नहीं करते। परंतु सिद्धार्थ ने ऐसा नहीं किया था। उन्होंने किसी भी सही समय का इंतजार नहीं किया, उन्हें जब समझ आ गया कि सही समय यही है तो वह बस निकल पड़े। बहुत देर वन मे भटकने के बाद सिद्धार्थ को एक सन्यासी नजर आता है। उस सन्यासी को देखने के बाद सिद्धार्थ प्रसन्न होते हैं। और उसकी ओर बढ़ने लगते हैं। उस सन्यासी के हाथ में धनुष बाण होते हैं। जिससे वह पक्षियों पर निशाना लगा रहा होता है। सिद्धार्थ उस सन्यासी के हाथ में धनुष बाण देखकर थोड़ा चौकते है।

सिद्धार्थ उस सन्यासी से पूछते हैं। भला एक सन्यासी के पास धनुष बाण का क्या काम? वह सन्यासी कहता है की मे  सन्यासी नहीं। मैं तो एक शिकारी हूं। वह दरअसल यह पक्षी एक सन्यासी की वेशभूषा देखकर डरते नहीं है। जिसके कारण इनका शिकार करना आसान हो जाता है। इसलिए मे एक सन्यासी के वस्त्र पहनकर इनका शिकार करता हूं।

सिद्धार्थ को उस व्यक्ति की बात से बड़ा धक्का लगता है। सिद्धार्थ उस व्यक्ति से पूछते हैं। परंतु तुम ऐसा करते क्यों हो। वह व्यक्ति कहता है यह मेरा व्यवसाय है। मैं अपने शिकार को बेचकर धन कमाता हूं। तो सिद्धार्थ उस व्यक्ति से कहते हैं। यदि तुम्हें धन की आवश्यकता है तो तुम मेरे इन वस्तुओं को ले लो और मुझे अपने वस्त्र दे दो। आभूषण तो मैं सभी छोड़ आया हूं। परंतु यह वस्त्र भी कुछ कम कीमती नहीं। इन वस्त्रों में हीरे मोती और सोने के तार जड़े हुए हैं।

तुम इन्हें ले लो और मुझे अपने यह सन्यासी के वस्त्र दे दो।  इस तरह की बहुत सारी नकारात्मकता से भरी घटनाएं सिद्धार्थ के जीवन में घटती है। परंतु सिद्धार्थ अपने मार्ग में आगे बढ़ते चले जाते हैं। कई वर्षों तक सिद्धार्थ सत्य की खोज में भटकते हैं। इन कई वर्षों में सर्दीया गर्मीया और बरसात कई बार आती है। परंतु कोई भी मौसम कोई भी परीस्थिति सिद्धार्थ को उनके  लक्ष्य तक पहुंचने से नहीं रोक पाती।

अब बहुत सारे लोग यह सोच रहे होंगे कि सिद्धार्थ अलग थे। उनके भीतर कुछ अलग था। तो इस प्रश्न का उत्तर सिद्धार्थ ने बुद्ध होने के बाद कई बार दिया है कि मनुष्य मनुष्य में कोई भेद नहीं। हर मनुष्य के भीतर बुध होने की उतनी ही क्षमता है जितनी मेरे भीतर थी। बुद्ध ने यह बात कई बार कही है। परंतु लोग फिर भी इस बात पर विश्वास नहीं कर पाते। अब आपका सवाल हो सकता है कि वह क्या चीज है। जिसका कोई भी नकारात्मकता कोई भी खराब परिस्थिति कुछ नहीं बिगाड़ पाती।  वह चीज है आपका साफ विजन। अगर आप साफ-साफ देख सकते हैं जो आप होना चाहते हैं। तो आप हो जाएंगे।

तो किसी भी बड़े से बड़े लक्ष्य को पाने के लिए हमें इन चीजों की आवश्यकता है। पहली एक बड़ा कारण और दूसरी एक बड़ा विश्वास और तीसरी एक साफ विजन। धन्यवाद

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