Buddhist Motivational Story on Law of Karma and Success

Buddhist Motivational Story on Law of Karma and Success
Buddhist Motivational Story on Law of Karma and Success

Buddhist Motivational Story on Law of Karma and Success

मानव जीवन का परम लक्ष्य क्या होता है? गुरुदेव, एक युवा शिष्य ने अपने गुरु से सवाल किया, गुरु ने विचार मग्न होकर उत्तर दिया कि निर्धन आदमी के लिए धन कमाना परम लक्ष्य होता है। एक बीमार मनुष्य के लिए स्वस्थ शरीर सबसे बड़ा लक्ष्य होता है। किसी भी इंसान के पास जिंस भी चीज़ की कमी होती है। वही उसका परम लक्ष्य बन जाती हैं ।  

उसे प्राप्त करने के लिए वो हर संभव प्रयास करता है। नाना प्रकार के षड्यंत्र रचता रहता है। उस वस्तु की कमी को पूरा करने के लिए भरपूर मेहनत भी करता है, लेकिन जब वो अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है तो उसकी उसमें से रूचि खत्म हो जाती है, उसका रस खत्म हो जाता है। सांसारिक लक्ष्यों की प्राप्ति से मन का भराव कभी नहीं हो सकता। मानव जीवन का परम लक्ष्य मन पर नियंत्रण होना चाहिए क्योंकि मनुष्य का मन ही उसे असीम शांति की तरफ ले जा सकता है। और कोई रास्ता नहीं है। आप चाहे जीवन में कुछ भी हासिल करलो लेकिन उन चीजों से मन का भराव कभी नहीं होगा ।

मन ही हमारे अंदर अशांति पैदा करता है। अगर उस मन को समझ लिया जाए, उसे अपने नियंत्रण में कर लिया जाए तो वो हमें कभी भी अशांत नहीं कर पायेगा। वो अशांति इसीलिए पैदा कर पाता है क्योंकि हम अपने मन को समझने का प्रयास नहीं करते ।

मन को समझने का काम 1 दिन में नहीं हो सकता है। धीरे धीरे अभ्यास के साथ मन की चाल पकड़ने आने लगती है। अपने मन पर नियंत्रण पाने के बाद तुम किसी भी चीज़ को किसी भी वस्तु को या फिर किसी भी सांसारिक लक्ष्य को बड़ी आसानी के साथ प्राप्त कर सकते हो। किसी भी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए मेहनत करनी पड़ती है, लेकिन मेहनत करने का मन नहीं करता है। ये मन ही होता है जो हमें अपने लक्ष्य की ओर आगे नहीं बढ़ने देता, उसमें से रुचि खत्म कर देता है।

शिष्य ने गुरु से दूसरा सवाल पूछा, गुरुदेव दुनिया में सबसे बड़ा कर्म कौन सा कहलाता है? गुरुदेव ने बड़े शांत स्वर में उत्तर दिया कि बिना लक्ष्य का कर्म ही असली कर्म होता है। हम जब भी कर्म करते हैं तो उसके पीछे कुछ ना कुछ लालच जुड़ा होता है। कुछ ना कुछ पाने की अभिलाषा होती है और वही लालच वहीं अभिलाषा उस कर्म को निष्कर्म बना देती है ।

अगर तुम बीना कोई उम्मीद लगाए, सिर्फ कर्म करते रहोगे तो तुम्हारे कर्म में ही तुम्हें सारा रस मिलने लगेगा। जिसप्रकार असली आनंद सफर का होता है ना की मंजिल का, उसी प्रकार असली आनंद कर्म का होता है ना कि लक्ष्य प्राप्त करने का। लक्ष्य प्राप्त करना तो अंतिम पड़ाव है, वो तो मंज़िल है, उसमें क्या आनंद मिलेगा? आनंद तो कर्म करने में होता है, लेकिन ज्यादातर मनुष्य यही भूल करते हैं।

किसी भी कर्म को करने से पहले वो अपना लक्ष्य सुनिश्चित कर लेते हैं। और यही उनकी सबसे बड़ी भूल होती है क्योंकि लक्ष्य सुनिश्चित करने के बाद उनका ध्यान सिर्फ लक्ष्य पर लगा रहता है। कर्म करने पर से उनका ध्यान हट जाता है। बिना लक्ष्य को सुनिश्चित किये हुए कोई करम करेगा ही क्यों? गुरुदेव क्योंकि जब मनुष्य अपना लक्ष्य निर्धारित करता है, उसी के अनुसार तो कर्म करता है। अगर वो अपना लक्ष्य ही सुनिश्चित नहीं करेगा तो उसे फिर कर्म करने की आवश्यकता ही क्या है?

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गुरुदेव ने बड़ा ही अद्भुत उत्तर देते हुए जवाब दिया कि मान लो तुमने कोई लक्ष्य सुनिश्चित किया उसके अनुसार कर्म भी किये और फिर वो लक्ष्य भी प्राप्त कर लिया, लेकिन लक्ष्य प्राप्त होने के बाद तुम क्या करोगे? लक्ष्य प्राप्त होने को अंत तो है नहीं, जीवन तो उसके बाद भी होता है तो उसके बाद के जीवन में तुम क्या करोगे? लक्ष्य तो प्राप्त हो चुका अब यहाँ तो तुमे मर जाना चाहिए या फिर कोई दूसरा लक्ष्य ढूंढना चाहिए क्योंकि अब करने के लिए कुछ बचा नहीं है। तुम अंतिम पड़ाव पर पहुँच चूके हो?

गुरुदेव मैं ज़ोर ज़ोर से हंसते हुए कहना जारी रखा कि जीवन में लक्ष्य प्राप्त करने के लिए नहीं मिला जीवन तो जीने के लिए मिला है। हर एक पल को तुम जी खोलकर जी सको। अगर कर्म को भूलकर लक्ष्य के पीछे भागते रहोगे तो एक लक्ष्य पूरा होने के बाद तुम तो दूसरे लक्ष्य के पीछे भागोगे और इसी प्रकार जीवन पर्यंत भागते रहोगे और ठहेरना कभी सीख ही नहीं पाओगे ।

और वहीं पर अगर तूम कर्म का आनंद लेना सीख गए लक्ष्य को भूलकर सिर्फ कर्म करने पर अपना ध्यान केन्द्रित करना। इस प्रकार का मन जीस इंसान का होता है। वो किसी भी कार्य को पूरे रस के साथ करेगा, पूरी रुचि के साथ करेगा, आधा अधूरा नहीं करेगा क्योंकि उसका पूरा ध्यान उस कर्म को करने पर लगा हुआ है। गुरुदेव ने उदाहरण देते हुए समझाया कि मानलो दो लोगों को एक पहाड़ी पर चढ़ने के लिए भेजा जाता है। उस पहाड़ी के शिखर पर पहुंचना ही उनका अंतिम लक्ष्य है ।

उन में से एक इंसान उस पहाड़ी के शिखर को देखता हुआ चल रहा है और दूसरा अपने कदमों पर ध्यान लगाकर चल रहा है। जिसका ध्यान शिखर पर टिका हुआ है। उसकी चेतना भविष्य में भटक रही है और जो अपने कदमों पर ध्यान लगाता हुआ चल रहा है, वहीं वास्तविकता में वर्तमान में उपस्थित है क्योंकि उसके कदम वर्तमान में चल रहे हैं और जो शिखर पर पहुंचने का लक्ष्य है।

वो भविष्य की कल्पना है। शिखर की तरफ देखने वाला हो सकता है कि ठोकर खाकर गिर पड़े। लेकिन जो अपने कदमों पर ध्यान लगाकर चल रहा है उसको कभी ठोकर नहीं लगे गी। चाहे वो शिखर पर ना पहुँच पाए लेकिन उसने अपने रास्ते का आनंद भलीभाती लिया है। उसने अपने चलने को भी ध्यान बना लिया है। अपने कर्म को ही ध्यान बना लिया है और इस प्रकार के कर्म मनुष्य को असीम शांति पहुंचाते हैं।

पूरी दुनिया भाग हो तो रही है, कोई धन के पीछे, कोई रिश्तों के पीछे, कोई किसी चीज़ के पीछे तो कोई किसी चीज़ के पीछे। हर मनुष्य इस संसार में भागता रहता है और वो कभी ठहरना ही नहीं सीख पाता। उसे हमेशा यही लगता रहता है। यह भ्रम होता रहता है कि एक बार लक्ष्य को प्राप्त कर लेता हूँ, उसके बाद तो असीम शांति मिलेगी।

लेकिन जब वो लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है तो वो अपने आप को और ज्यादा फसा हुआ महसूस करता है। आनंद और शांति तो दूर की बात रही। लक्ष्य को प्राप्त करने के बाद उसकी चिंताए उसकी जिम्मेदारियां और ज्यादा बढ़ जाती है। अगर तुमने ₹1000 का लक्ष्य प्राप्त कर लिया तो अगला लक्ष्य तुम्हारा ₹1,00,000 के लिए होगा, उसके बाद करोड़ रुपये के लिए और इस प्रकार मन का भराव इन लक्ष्यों से कभी नहीं हो सकता। हाँ, हम सन्यासियों और भिक्षुओं की भाँति अपने मन को नियंत्रित करना सीख सकते हैं। अपने कर्म मे ही आनंद खोज सकते हैं जहाँ पर मनुष्य संतुष्ट होना सीख लेता है। वहीं पर उसके जीवन में शांति का प्रवेश होने लगता है।

हमारी सारी अशांति का कारण सिर्फ हमारी असंतुष्टि है। अपने आसपास नजर घुमाएंगे तो ऐसे बहुत से लोग नजर आएँगे जिन्होंने जीवन में लक्ष्य तो प्राप्त किए लेकिन वो लक्ष्य प्राप्त करने के बाद उनका जीवन और ज्यादा अशांति से भर गया। वो लक्ष्य ही उनके लिए अभिशाप बन गया। वास्तविकता में मनुष्य अपनी मन मे तों यही सोचता है कि लक्ष्य प्राप्त करने के बाद मुझे बहुत शांति मिलेगी, लेकिन उस लक्ष्य को प्राप्त करने के कुछ समय बाद ही एहसास हो। लगता है की वो लक्षण निरर्थक था, उसकी कोई सार्थकता नहीं थी।

मनकी आकांक्षाएं अनगिनत है। संसार की यात्रा कभी पूरी नहीं होती। जिनको अपने भीतर मुड़ना होता है, उनको बीच से ही लौटना पड़ता है। शिष्यने सवाल पूछा कि गुरुदेव तो फिर क्या जीवन में कोई लक्ष्य नहीं होना चाहिए? क्या हमें बिना लक्ष्य जीना चाहिए? ऐसे तो हमारे और जानवरों के जीवन में कोई भेद नहीं होगा। गुरुदेव ने उत्तर दिया कि लक्ष्य की प्राप्ति उस कर्म को करने पर निर्भर होता है। अगर तुम किसी कर्म को पूरा मन लगाकर पूरे ध्यान से करोगे तो निश्चित है। उसका परिणाम भी तुम्हें उचित ही मिलेगा।

तूम अपने जीवन में कर्म करते जाओ, फल की चिंता मत करो, वो तुम्हें अपने आप प्राप्त होंगे। प्रकृति तुम्हारे पास खुद तोफ़े  लेके आएगी, उपहार ले के आएगी, लक्ष्य तुम्हें खुद प्राप्त होंगे। तुम बस अपने कर्म पर ध्यान टिकाकर रखो, लेकिन भूल तो यही होती है कि हम ज्यादा समय तक सिर्फ कर्म पर अपना ध्यान टिकाकर नहीं रख पाते। हमारा मन परिणाम के बारे में सोचने लगता है और परिणाम भविष्य का रूप होता है।

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वर्तमान में तुम परिणाम के बारे में नहीं सोच सकते। परिणाम भविष्य में घटित होने वाली घटना है और ध्यान तुम्हें भविष्य से वर्तमान में खींचकर लेकर आता है। सारी चिंता सारे तनाव का कारण भविष्य और अतीत की कल्पना होती है। या तो हम अतीत के बारे में सोचते रहते हैं या फिर भविष्य की कल्पना करते रहेते है।

खाना खाते समय अगर मनुष्य खाने पर अपना ध्यान टिकाकर रखता है तो इससे उसे कोई लक्ष्य प्राप्त नहीं होगा, लेकिन उस खाने का आनंद वो पूरी तरह से ले सकता है, लेकिन अगर खाना खाते समय वो किसी दूसरे लक्ष्य के बारे में सोचता रहेगा तो वो उस खाने का पूरा आनंद नहीं ले पाएगा। उस खाने को वो ध्यान नहीं बना पाएगा और बुद्धिमान वो लोग होते हैं जो हर कर्म को ध्यान बना लेते है।

हर एक कर्म तभी ध्यान बन सकता है जब उसे पूरी जागरूकता पूरे होश और पूरे ध्यान के साथ वर्तमान में रहकर किया जाए। ना उसके परिणाम के बारे में सोचा जाए और ना ही उसे जल्दी खत्म करने के बारे में सोचा जाए। पूरे संयम के साथ पूरा ध्यान टिकाकर जब कोई कर्म किया जाता है तो उस कर्म के फलीभूत होने की संभावना बढ़ जाती है। लेकिन याद रहे ना हम परिणाम के बारे में सोच रहे हैं और ना ही संभावनाओं के बारे में।

अपने दैनिक जीवन में भी हम बहुत से कर्म ऐसे करते हैं जिनके पीछे कोई लक्ष्य नहीं जुड़ा होता। जैसे की खाना, खाना, टहलना या फिर दूसरों से बातचीत करना। इनके पीछे कोई लक्ष्य नहीं होता और इन्हें कर्मों को अगर पूरा ध्यान लगाकर किया जाए तो तुम्हारा हर कर्म ध्यान बनता चला जायेगा। फिर तुम्हें ध्यान करने के लिए अलग से बैठने की जरूरत नहीं रहेंगी। जब भी तुम अपनी आंख बंद करके ध्यान लगाने की कोशिश करोगे तो तुम ततक्षण उस ध्यान की गहराई में जा पाओगे। क्योंकि तुमने दैनिक जीवन में ध्यान का अभ्यास किया है, हर कर्म को ध्यान बना लिया है।

अपने हर एक कर्म को ध्यान बनाने की ना कुछ तरीके बताता हूँ, धीरे धीरे अभ्यास के साथ तुम इतने निपुण हो जाओगे कि तुम एक ही जगह पर अपना ध्यान बहुत देर तक टिका कर रख पाओगे और तब तुम किसी भी सांसारिक लक्ष्य को बड़ी आसानी के साथ प्राप्त कर सकते हो क्योंकि तुम एक जगह पर एक बिंदु पर अपना ध्यान बहुत देर तक टिका कर रख पाते हो। सबसे पहले सब कोई भी कर्म कर रहे हो तो पूरा ध्यान उस कर्म को करने मे लगाओ। और ये बड़ा आसान होता है। इसका अभ्यास हम रोज़मर्रा की जिंदगी में भी कर  सकते है।

अगर तुम खाना खाते हो तो पूरा ध्यान खाना खाने पे लगादो खाना खाते समय अगर कोई विचार आ रहा है। तो फिर से अपना ध्यान खाना खाने पर लेकर आओ रोटी को चबा रहे हो तो चबाने पर ध्यान लगाओ। अगर पानी पी रहे हो तो उस पीने पर ध्यान केंद्रित करो। शुरुआत में थोड़ी समस्याएं आएंगी, आप विचारों में भटक जाएंगे। आपको खो जाएंगे आपको खुद ध्यान नहीं रहेगा, लेकिन जब भी ध्यान आए, अपने ध्यान को खींचकर वापस वहीं पर लेकर आओ।

और धीरे धीरे अभ्यास के साथ आप विचार शून्य होते जाएंगे। अभी तो खाना खाते समय तुम कुछ और सोच रहे होते हो। तुम्हारा शरीर वहाँ पर होता है लेकिन तुम्हारा मन कहीं और भटक रहा होता है। वो भविष्य की कल्पना कर रहा होता है या अतीत की यादों में खोया रहता है, लेकिन जब धीरे धीरे समय के साथ कर्म पर ध्यान टिकाना शुरू हो जाएगा तो तुम्हारे मन का दर्पण एकदम साफ हो जाएगा। उसके ऊपर विचारों का कीचड़ नहीं रहेगा। बिल्कुल स्पष्ट नजर आएगा और जब मन साफ हो जाता है तो उसमें आनंद की झलकियां आने लगती है ।

तब हमें पता चलता है कि जीवन का आनंद क्या है, जीवन का रस क्या है। जीवन का रस, विचारों में डूबे रहना नहीं है। विचारों से मुक्त होकर विचार शून्य होकर जीवन जीना है, विचारशून्य होकर रस लेना है, विचारशून्य होकर आनंद को महसूस करना है। जीवन में तनाव का सबसे बड़ा कारण होता है विचारों से भरे रहना।

निरर्थक बातों के बारे में सोचना जिनसे निर्थक भावनाएँ पैदा होती है जैसे कि जलन, गुस्सा और यही सारी चीजें अशांति का सबसे बड़ा कारण होती है। इसीलिए अगर इन भावनाओं को पैदा होने से रोकना है तो हमें यह देखना होगा कि इन भावनाओं के पीछे विचार कौन से हैं और धीरे धीरे ऐसे विचारों से मुक्त होकर विचारशून्य होने का अभ्यास करना ध्यान रहे। विचारों को जबरदस्ती नहीं रोकना है, बस उन्हें देखते रहना है और देखते देखते वो विचार अपने आप मिटने लग जाएंगे। विचारों की सत्ता तभी तक होती है जब तक वो हमें दिखाई  नहीं पडते।

एक बार विचार दिखाई पड़ने लग जाए तो सारे विचार गायब होने लग जाते हैं और पीछे छूट जाता है एक बड़ा शून्य । जो शून्य आनंद का स्रोत है, जिस शून्य को अनुभव करने के लिए नाना प्रकार के साधु, संत, सन्यासी पूरी उम्र पूरी जिंदगी ध्यान करते रहते हैं। वहीं शून्य हमें ग्रस्त जीवन में जीते हुए प्राप्त करना होता है और वो तभी प्राप्त हो सकता है जब हम अपने विचारों को देखना शुरू करें और देखते देखते विचार मिटने लग जाए।

यह कहकर गुरु ने शिष्य की पीठ थपथपाते हुए कहा कि ध्यान करने से ही हम अपने विचारों को समझ पाते हैं। इसीलिए अपने जीवन में ध्यान करने की आदत पालो रोज़ ध्यान करो चाहे थोड़ी देर के लिए ही सही और तुम अपने जीवन में बड़े बदलाव महसूस कर पाओगे। जीवन को लेकर तुम्हारी समझ अपने आप बढ़ने लगेगी। तुम्हारे अंदर के जितनी भी सवाल है वो अपने आप मिटने लगेंगे और ये कहकर गुरु वहाँ से प्रस्थान कर गए।

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